शेष तुम वहां से चिट्ठियां तो लिखोगे न ? चिट्ठियां ! कम ओन ईति, मैं सिर्फ पंद्रह दिन के लिए जा रहा हूँ | इतने दिनों में कौन सी चिट्ठी यहाँ पहुंचेगी ? वो सब मैं नहीं जानती, तुम्हें चिट्ठी लिखनी पड़ेगी | कॉलेज से भी तो लिखते थे तुम |
वो चिट्ठियां तो जैसे तैसे पहुँचती थी न तुम तक | उस ज़माने में हम दोनों के पास मोबाइल भी तो नहीं होता था | अभी तो मोबाइल है न, sms या फ़ोन करूँगा ही, फिर ईमेल भी तो है न | उतने से काम नहीं चलेगा ? नहीं, चिट्ठी हाथ से लिखी जाती है | मुझे वही चाहिए, फिर इतने दिन के लिए जा रहे हो | क्यों नहीं लिख सकते एक चिट्ठी ?
“मगर पोस्ट से टाइम से आएगी क्या चिट्ठी ?” शेष का सवाल ख़त्म होने से पहले ही ईति ने बता दिया, “तो तुम कूरियर से भेज देना न ! बल्कि अभी जा ही क्यों रहे हो थोड़े दिन बाद क्यों नहीं प्रोग्राम बनाया ?” शेष समझाने की नहीं अब बातें सुनने की ही कोशिश में था, “अच्छा ईति तुम्हारे लिए वहां से कुछ लाना भी होगा क्या ?”
“नहीं कुछ मत लाना, पैसे फिजूल ख़र्च करने की जरूरत क्या है ? सब कुछ तो यहाँ मिल ही जाता है | तुम चिट्ठियाँ लिख देना बस !” “ईति तुम चिट्ठियों के पीछे इतनी पागल क्यों हो रही हो ? थोड़े ही दिन के लिए तो जा रहे हैं न, पलक झपकते तो वापिस आ जायेंगे |” “तुम नहीं समझोगे शेष, अच्छा ये नीली शर्ट छोड़ जाना | मैं पहनूंगी | इस से तुम्हारी खुशबु आती है |” “हे भगवान् ! अब रोने की क्या बात हो गई सरकार ? शर्ट भी मिल जाएगी, चिट्ठियां भी आ जाएँगी, क्या बचपना है ये ?”
“चिट्ठी पोस्ट से ? पंद्रह दिन में एक भी नहीं पहुंचेगी शेष, मुझे खाली खाली लगेगा |” “नहीं ईति, चिट्ठी तो शैल के पास छोड़ी हैं न, पुराने ज़माने की तरह वो आ जायेगा पहुचाने | तीन दिन में एक ही लेकिन, बाकि कार्ड्स हैं, आज कल पता है थोड़े महंगे हो गए हैं |”
“आहा सरकार, ये गोल गोल आँखें कर के घूरना छोड़ो ! तुम्हें क्या लगा था ? मजा आ रहा होगा जाने में हमें ? चिट्ठियां और कार्ड्स सारे लिख रखे हैं, मिल जायेंगे |” ईति को रोना और हँसना अब साथ ही आ रहा था | कमीज़ पर आंसू भी गए |
“तुम जल्दी आ जाना शेष”
“जैसा सरकार का हुक्म हो, अभी गए और अभी हाज़िर हुए, अब ये सोचो की जवाब कैसे दोगी चिट्ठियों का ?” “जैसे तुमने भेजी हैं, वापसी के ख़त भी वहीँ होंगे”

कसीद के आते आते ख़त एक और लिख रखूँ, मैं जानती हूँ वो क्या लिखेंगे जवाब में…

(February 15, 2015)

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