बैरी तर के बात हम ता कहिये देबैय ना..

मैथिली का ये एक बड़ा पुराना किस्सा है | लोक कथाओं की श्रेणी के ये किस्से शायद ही किसी ने लिख के जुटाए होंगे | छापा तो शायद ही किसी ने हो ! खैर तो ये किस्सा है एक ऐसे आदमी का जो अपनी ससुराल जा रहा होता है | पुराने ज़माने में यातायात के साधन तो कम ही थे, आज भी कई इलाकों में बरसात के मौसम में आपको पैदल ही जाना होगा | कुछ भी चलने लायक सड़क नहीं होती |

तो जनाब लाठी कंधे पर, गमछे में बंधा सत्तू और लोटा, उसकी लाठी में टाँगे हुए चले जा रहे थे | शादी के समय ही विदाई होती नहीं थी, बाद में गौना (द्विरागमन) की रस्म होती थी तो नयी नवेली दुल्हन से मिलने ज़नाब, धड़कते दिल में तराने लिए चले जा रहे थे | कोई दो चार कोस दूर थी ससुराल की साहब को जोर की लग आई | अब क्या करें ? “सुलभ शौचालय” का जमाना थो था नहीं, दूर दूर तक फैले खेत ही थे !

तो इधर उधर नज़र दौड़ा कर ज़नाब ने एक तालाब देखा और वहीँ एक बेर के पेड़ के नीचे जा बैठे, हलके होने | पेड़ के नीचे कुछ पके बेर भी टूट कर गिरे हुए थे तो बीच बीच में एक दो बेर उठा कर खा भी लेते थे | थोड़ी देर में फ़ारिग होकर फिर ससुराल पहुंचे | दामाद जी की आव-भगत की तैयारी हुई, फ़ौरन मछली पकी | सारे दिन लोग बैठे गप्पें मारते रहे | शाम में गाँव में किसी गवैये का कार्यक्रम था | सब लोग दामाद जी को लेकर दलान में जा बैठे |

हारमोनियम, सारंगी और ढोल की थाप पड़ी गवैये ने गीत उठाया, “बैरी तर के बात, हम त कहिये देबैय न..” (बेर के पेड़ के नीचे की घटना मैं तो बता ही दूंगा) | अब तो दामाद जी घबराये, मेरे दिशा मैदान करते करते में बेर खाते जाने की बात अगर इसने कह दी तो ससुराल में बड़ी हंसी होगी | ससुर टाइप लोग तो शायद ध्यान कम भी दें, मगर साले-सालियाँ तो जीना मुहाल कर देंगे ! फ़ौरन साहब ने कुछ पैसे गवैये की तरफ़ उछाले ! अब गवैये ने देखते ही समझ लिया था की गाँव में किसी का दामाद है ये, और दामाद जी ने पैसे दिए हैं तो जरूर गीत पसंद आ गया है |

दामाद जी की पसंद पर कैसे न ध्यान दिया जाए ! गवैये ने वही लाइन पकड़ ली, फिर अलापा, “बैरी तर के बात, हम त कहिये देबैय न..” ! दामाद जी ने फिर कुछ पैसे देकर चुप कराने की कोशिश की, मगर जैसे जैसे पैसे मिलते जाते थे गवैया सोचता था दामाद जी को पसंद है | वो फिर से वही लाइन गा देता ! आखिर दामाद जी के जेब में पैसे ख़त्म होने लगे, दामाद जी खिसिया के खड़े हो गए ! की कैह देबहीं ? याह न की टट्टी करैत बेर खैत रहिये.. कैह दे जो !! (क्या कहोगे, यही न की टट्टी करते करते मैं बेर खा रहा था, जाओ कह दो !)


युगपुरुष ने दिनों या महीनों के लिए नहीं, पांच साल की सरकार बनाई है | मिडिया से कुछ नहीं कहेंगे, चाहे जो पूछ लें, न बिट मिलेगी न बाईट ! जिसको जो कहना है कह ले भाई दामाद जी के मित्र हैं, कुछ नहीं बोलेंगे !

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