“आहा एक ही रिंग में उठा लिया ! जाग भी रहे थे और फोन भी पकड़े बैठे थे ?”
“नहीं ईति, सो रहे थे फ़ोन साइलेंट कर के |”
“झूठे हो कितने बड़े, फिर फ़ोन कैसे उठाया ? मुझे पता है तुम्हें नींद नहीं आई होगी | लैपटॉप में नाक घुसेड़े बैठे होगे | ऑफिस का काम कर रहे थे या सोशल नेटवर्किंग ?”
“दोनों ही चल रहे थे, नींद नहीं आई तो | बोर हो गए अब |”
“पता है आज सुबह से टिकट लेने बैठी रही और एक मिनट में ही सात वेटिंग लिस्ट हो गया | प्रीमियम तो बोहोत महंगा हो जायेगा न शेष ?”
“जब जाते समय वापसी का टिकट नहीं लिया था तो लगा था की शायद तुम कुछ ज्यादा दिन रुकना चाहती हो माँ के पास, इसलिए ध्यान नहीं दिया | होली अभी बीती है अभी तो सारी ट्रेनों में भीड़ होगी न ?”
“हां, लेकिन मुझे मज़ा नहीं आ रहा तुम्हारे बिना | लेकिन मेरा टाइम तो कट जाता है न सब लोग हैं अभी घर पे | तुम अकेले बिलकुल बोर हो जाते होगे | कैसा बीता तुम्हारा सुबह से ?”
“सुबह भी अजीब है अलसाई सी पड़ी रहती है तकिये पे…… तुम्हारे, क्लिप से टूटे बालों के साथ !”
“ओह गॉड ! सुधार जाओ मियाँ मजनू दो साल हो गए | कम से कम तकिये से कवर तो बदल देते | वैसा ही ‘सजा’ रखा होगा बेडरूम जैसा मैं छोड़ के आई थी ?”
“ऑफ़ कोर्स सरकार ! कम से कम तुम्हारी खुशबु तो आती है |”
“प्रीमियम में पैसे थोड़े ज्यादा लगेंगे | मैं प्रीमियम तत्काल में टिकट ले लूँ कल ?”
“अब ये भी कोई हमसे पूछने की बात है ? जितनी जल्दी आओ मेरे लिए तो उतना अच्छा !”
“ठीक है मैं कल टिकट लेने के बाद तुम्हें फ़ोन करुँगी | ऑफिस में होगे उस वक्त ?”
“अब इतने भी बिजी नहीं होते सरकार !”
“ठीक है फिर कल फ़ोन करुँगी, अब रखूँ ?”
“Well…”
“जी नहीं… भूल जाओ.. रख रही हूँ मैं हुंह !!”
कुछ मुझे यास, कुछ मुझे उम्मीद…
सब्र के साथ, क्यों जाने इज़्तराब भी है…
(March 13, 2015)
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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