“नोज़ रिंग के डायमंड से iphone तक हर चीज़ पर एक्स रे चला दें इनका बस चले तो ! ऊपर से लगातार की बक बक ! कस्बों की सारी पड़ोस की आंटियां ऐसी होती हैं या पता नहीं मेरी ही किस्मत में पड़ी है |” सोचते सोचते ईति अन्दर आई और फ़ोन ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया, “साइलेंट तो कर ही दिया, ये बड़े झुमके उतार लूँ |” दरवाज़े पर कोई महसूस हुआ तो ईति ने मुड़कर देखा, भैया थे, मुस्कुराकर देखा और आगे चल दिए | केटरर को कुछ समझाना है शायद | कितनी चीजें बदल गई हैं, इसी भैया से कुश्ती लड़ा करती थी दिन भर, इस बार बातें भी नहीं हो पा रहीं |”
फ़ोन की लाइट के ओन्न ऑफ से ईति का ध्यान टूटा, नंबर वही था पहचाना सा | फ़ोन के साथ ही ईति ने उसके नीचे दबा अख़बार भी उठा लिया |
“मत करो ना ऐसा, एक बार तो घर पर बात करके देखो !”
“नहीं कर सकती, जवाब पता है मुझे उनका। सुनो शेष वैसे भी तुम्हारी ज़िंदगी से चली भी गयी तो क्या फर्क पड़ेगा तुमको। मुझसे पहले भी तो तुम्हारी ज़िंदगी में प्रिया और शिखा थी, मेरे बाद कोई और…”
“वो मेरी ज़िंदगी में थी, तुमसे मेरी ज़िंदगी है”
हाथ में अखबार था और थी शहर की ख़बरों के बीच उसकी पंखे से झूलती फोटो एक कॉलम की छोटी सी खबर के साथ।
“अरे दीदी बाहर आओ मेहंदी वाली बुला रही है, जल्दी करो सबसे ज्यादा टाइम दुल्हन की मेहंदी लेती है!” बहन और उसकी सहेलियों की चुहल भरी आवाज़ और तेज़ होती ढ़ोलक की थाप के बीच उसकी सिसकियाँ और “तुमसे मेरी ज़िंदगी है” की बुदबुदाहट भी घुलने लगी |
माँ जल्दी जाने को कह गई, हैरान परेशान है दोनों बुआ और मेहमानों की देखभाल में |
“एक एक्सप्रेस तीन चालीस की है, पेसेंजर सवा चार बजे | वेट कर लूँ मैं ?”
घड़ी में डेढ़ ही बजे थे, मेहँदी लगाने का पैंतालिस मिनट या एक घंटा स्टेशन पहुँचने का आधा घंटा और |
ईति मुस्कुरा दी, “दुल्हन तो मेहँदी लगा कर जाएगी …”
(March 13, 2015)
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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