अब जैसे की पुरुष बहस होने पर सीधे, सपाट और कठोर शब्दों का इस्तेमाल करते है | इस से फायदा ये होता है की बात एक बार में समझ में आ जाती है | लड़कियां लकिन ऐसी भाषा से आपकी बात मान लें, ये हरगिज़ नहीं होता | वो बहस से बचने के लिए उस समय बात को टाल जाएँगी, फिर कुछ 12-15 साल बाद वो ही बात आपकी, आप ही को ,याद दिला देंगी | औरतें बरसों तक छोटी छोटी बातें याद रखती हैं, जो बेचारे लोग जन्मदिन या और कोई जरूरी तारिख भूले हैं वो ये भी बता देंगे की ऐसी चीज़ें भूलने पे क्या होता है, या यूँ कहिये की क्या-क्या होता है !
जब कोई लड़की आपके “क्या हुआ ?” पूछने पर कह दे, “कुछ नहीं !” तो शाब्दिक अर्थ पर हरगिज़ मत जाइये, वरना “बहुत कुछ” होने के ज़िम्मेदार आप ख़ुद होंगे | “ठीक है” तो उस से भी बड़ी आफ़त है, लड़की के “ठीक है” का अगर वही मतलब निकाला जो होता है, तो फिर शायद ही कुछ भी ठीक बचे | अगर कहीं आपने किसी काम को करने या न करने के लिए पुछा और जवाब मिला “जैसा तुम ठीक समझो !!”, तो साहेब वो काम करने का पाप हरगिज़ भी मत कीजियेगा | प्रायश्चित का भी मौका नहीं मिलेगा !!
ऐसे मसलों पर अंग्रेजी में कई चर्चित किताबें भी लिखी गई हैं, हिंदी में नहीं लिखी जाती हैं शायद | हमारी समझ में ये बातें तब आई जब कॉलेज की पढाई के दौरान एक सीनिअर ने “सप्रेम” समझाई | हमने निरीह प्राणी सी शकल बना के कहा, मान्यवर आपकी बात तो समझ आ गई, लेकिन, किन्तु, परन्तु, गलतियाँ तो फिर भी होंगी ही ! निरीह प्राणी सी शकल बनाने के हम पुराने अभ्यस्त हैं तो महोदय ने सबसे पहले मेरा ध्यान इसी तरफ दिलाया | फिर समझाया की हे मूढ़ प्राणी ! जितना कम बोलेगा तेरी बातों में वजन उतना ही ज्यादा होगा ! तब से पहला काम हमने यही किया की भली सी शकल बनाकर सारी बातें सुन लेते हैं | जवाब किसी बात का नहीं देते | इस से आसान तरीका तो कोई हो ही नहीं सकता |
फिर उन्होंने हमें दूसरी तरकीब बताई | कहा कुछ जवाब पहले से सोच के रखो ! हमने पुछा, साहेब लेकिन सवाल कहाँ पता हैं ? तो एक सवाल भी सुझा दिया, “मैं मोटी हो गई हूँ क्या ?” हमने कहा इसमें क्या है ? कह देंगे अगर मोटी लग रही होगी तो हाँ वरना, ना ! मुफ़्त की एक चपत भी रसीद की गई हमें, फिर बताया गया अबे बुड़बक ! इस सवाल का जवाब हमेशा ना ही होता है, फिर चाहे कुछ भी हो जाए ! बस ध्यान ये रखना है की सीधा ना या हां मत कह देना, लड़कियां साफ़ झूठ पकड़ लेंगी | तुझे ऐसे ना कहना है की बात टाली भी जा सके |
बता क्या बोलेगा कहते हुए वो मुझपे चढ़ बैठे | हमने सोच कर कहा “नहीं, बिलकुल भी नहीं हुई, ऐसा किसने कहा ?” हम्म उन्होंने सर हिलाया, कहा चलेगा, मगर एक और सोच के बता | हम फिर से अकल के घोड़े दौड़ाये, कहा, “अरे नहीं, बल्कि तुम्हारी height पर तो थोड़ा वजन बढ़ा लो तो अच्छा ही लगेगा” | इस बार उन्हें जवाब जरा संतोषजनक लगा, सर हिलाते हुए कहा चल एक और जवाब सोच के बता !! हमने बुद्धि पर थोड़ा और जोर डाला, कहा, “अरे तुम तो घर से भी आती हो तो लगता है किसी अकालग्रस्त इलाक़े से आई हो !! तुम कहाँ मोटी हुई हो ?” इस जवाब पर साहब के चेहरे पर मुस्कान भी आ गई, बोले, शाबाश !! अब तू सीख रहा है !
हमारी प्रैक्टिस तो अभी जारी है, समस्या ये है की आज कल संस्कृत और जर्मन सीखने को ले के बहस छिड़ी हुई है | अब ये जो असली, काम की, कूट भाषा है, सवाल ये है की ये कब सिखाई जाएगी ?
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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