भारत में जब गुरुकुल की परंपरा थी तो शिष्य सभी गुरुओं के पास ही रहते थे | गाँव से शहर से दूर कहीं आश्रम होता था | दूर दूर से सफ़र कर के बच्चे गुरुकुलों में आते, खाना भिक्षा से और आश्रम की ज़मीन पर खेती से चल जाता | सुबह से शाम तक पढाई होती, खाली समय में गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे बच्चे | तो ऐसे ही एक दिन का किसी गुरुकुल का किस्सा है |

गर्मियों की दोपहर थी और दो बच्चे गुरूजी के पांव दबा रहे थे | थोड़ी ही देर में गुरूजी को नींद आ गई और बच्चे पांव दबाते रहे | गोरुजी के सोते ही बच्चों ने बात चिट शुरू की आपस में | बातों ही बातों में बच्चों ने तय किया की ये वाला पांव मेरा और वो वाला पांव तेरा | एक पांव तू दबा एक मैं दबाता हूँ |

दोनों बच्चे पैर दबाते रहे और एक एक टांग को अपना मानने लगे | थोड़ी देर में एक बच्चे का हाथ दुसरे वाले पांव को छु गया | दुसरे बच्चे ने डांट दिया, मेरा वाला पांव मत छु | थोड़ी देर में पहले बच्चे का हाथ फिर से दुसरे वाले पांव को लग गया, अब तो दूसरा बच्चा भड़क गया | चिढ़ कर बोला tune फिर मेरे वाले पांव को हाथ लगाया मैं भी तेरे वाले पैर को छुउंगा ! और कहते कहते छू भी लिया | अब पहले वाले बच्चे ने कहा मेरा हाथ तो गलती से लगा था तूने जान बूझ कर क्यों छु लिया ? उसने भी दूसरा पांव छु लिया |

थोड़ी ही देर में बहस बढ़ गई | मेरा पांव तेरा पांव होने लगा | उधर गुरूजी बेचारे सो रहे थे इधर एक ने तलवार उठा ली, कहा मैं तेरी वाली टांग ही काट डालूँगा ! दुसरे ने भी मुसल उठा लिया, कहा मैं तेरी वाली टांग तोड़ दूंगा !! गुरूजी बेचारे सोये रहे और पड़े धड़ा धड़ दो वार !! बेचारे गुरूजी की टाँगे…

अब एक तरफ मीडिया और सेक्युलर ब्रिगेड है तो दूसरी तरफ़ हैं उग्र हिन्दुवाद के पैरोकार !!

जगाओ भाई… कोई जगा दो… वरना टांगें तो गई…

(March 18, 2015)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here