शायद ही महाभारत किसी ने पूरा पढ़ा हो, और जब ऐसे लोग मज़ाक उड़ाते हैं ये कहकर की “जो आपके धर्म ग्रंथों में नहीं वो तो हो ही नहीं सकता !” तो हंसी आ ही जाती है | दूसरी बात ये है की काव्यात्मक ग्रन्थ भी वैज्ञानिक ग्रंथों की तरह प्रतीकों पर आधारित होते हैं | एक छोटा सा अंतर ये है की वैज्ञानिक प्रतीक का एक ही अर्थ होता है, काव्य में अक्सर प्रतीक का एक से ज्यादा अर्थ होगा |
जब टीवी में महाभारत या रामायण जैसे सीरियल दिखाते हैं तो वो युद्ध पर समाप्त हो जाता है | लेकिन जब आप पढ़ने जायेंगे तो ये युद्ध महाभारत या रामायण का बहुत छोटा सा हिस्सा है | असली कहानी या तो उस से पहले है या फिर उसके बाद | अठारह पर्व होते हैं महाभारत में | महाभारत के युद्ध के बाद वनपर्व और अनुशाषण पर्व जैसे हिस्से हैं |
वनपर्व में एक ब्राम्हण की कथा आती है | ये ब्राम्हण उपवास किये हुए था और कई दिनों से इसने खाया नहीं था | जीविका के लिए वो दक्षिणा, कन्द मूल और भिक्षा पर निर्भर था | एक दिन जब वो एक नगर के पास था तो उसने एक घर से भिक्षा लेने की सोची | तो नगर में एक घर के सामने जाकर रुका, और बाहर से ही भिक्षा के लिए आवाज़ दी | गृहणी किसी कार्य में व्यस्त थी | उसे भिक्षा मांगने की आवाज़ सुनाई नहीं दी शायद | एक दो बार ब्राम्हण ने और आवाज़ लगाई, थोड़ी देर में गृहणी आई |
इतनी देर में भूखा ब्राम्हण गुस्से में आ गया था | गृहणी के बाहर आते ही ब्राम्हण ने पुछा, क्या आपको मेरी आवाज़ नहीं सुनाई दी ? गृहणी ने व्यस्तता समझाने की कोशिश की, लेकिन भूखा ब्राम्हण अब तक इंतज़ार करते करते आग बबूला हो चूका था | वो शाप से गृहणी को जला देने को आतुर हो गया | जैसे ही लेकिन उसने कमंडल से जल लेकर छिड़का, गृहणी पर कोई असर ही नहीं हुआ ! उसने दोबारा प्रयास किया मगर इस बार भी कोई नतीज़ा नहीं निकला |
अब तो ब्राम्हण बड़ा लज्जित हुआ ! गृहणी ने उसे समझाया आपका धर्म का ज्ञान अधुरा है विप्रवर, अब तो लज्जित ब्राम्हण ने उसी गृहणी से शिक्षा लेने का प्रयास किया | मगर गृहणी ने बताया नगर के बाहर एक व्याध की मांस की दुकान है | वो अपने माता पिता का बड़ा भक्त है | आप वहां जाएँ और उस व्याध से अहिंसा और धर्म की शिक्षा लें तभी आपको ज्ञान की प्राप्ति होगी | ब्राम्हण को फिर उस व्याध के पास उसकी मांस की दुकान पर गया और उस से अहिंसा की शिक्षा ली |
महाभारत में अर्जुन कहते हैं–
सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित्।
पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः।। महाभारत, शान्तिपर्व, 15.29
अर्थात्; ‘इस जगत में ऐसे–ऐसे सूक्ष्म जन्तु हैं कि जिनका अस्तित्व यद्यपि नेत्रों से देख
नहीं पड़ता तथापि तर्क से सिद्ध है; ऐसे जन्तु इतने हैं कि यदि हम अपनी आँखों की पलक हिलाएं तो उतने से ही उन जन्तुओं का नाश हो जाता है।’ ऐसी अवस्था में यदि हम मुख से कहते रहें कि ‘हिंसा मत करो, हिंसा मत करो’ तो उससे क्या लाभ होगा ?
“आप रूचि भोजन, पर रूचि श्रृंगार” मतलब जिसके लिए सज संवर रहे हों, कपड़े तो उसकी पसंद से पहन लेंगे हम, खाना मुझे अपनी मर्ज़ी का ही खाने दे महानुभाव |
(मार्च 17, 2015)

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