“तुम आज भी टाइम से नहीं पहुंचे थे न शेष ?” अचानक के ईति के सवाल ने ऑफ बैलेंस कर दिया | हफ्ते भर की छूटी हुई आदत, जब हर वक्त किस्म किस्म के सवाल होते नहीं थे | “ये पहाड़गंज वाली साइड की तरफ़ सब ऐसी ही संकरी गलियाँ होंगी ? फिर सारे विदेशी यहाँ कहाँ आ के होटलों में रुकते हैं ? सारा दिन तो हाईजीन हाईजीन करते हैं, हिपोक्रेट कहीं के !”
“हम लोग फ्लाईओवर पार कर के वापिस अजमेरी गेट की साइड आ गए थे नहीं तो लगभग सारी गलियाँ वैसी ही हैं | बस तुम पहाड़गंज देखने के शौक में मरी जा रही थी !”
“अजमेरी गेट ही बेटर है, घर तक का रास्ता मुश्किल से बीस मिनट का और सेंट्रल दिल्ली की खाली सड़कें | ये सारे पेड़ संजय गाँधी ने लगवाए थे कोई यकीन करेगा ? चाबी दो | देखें साहब ने क्या क्या उजाड़ रखा है !”
“ओह कम ओन ! इतने भी निकम्मे नहीं हम सरकार | बेडरूम के अलावा बाकि जगहें देखना, वो तुम्हें पसंद नहीं आएगा | कॉफ़ी ?”
“तुमने घोल के रखी है ? हाय !! अब मेरे नारीवादी भाषणों का क्या होगा ! मालूम होता है मुझे मिस किया गया है |”
“अब ये भी पूछने की बात है सरकार ? आपके बगैर फ्लैट घर कहाँ होता है |”
“रुक्को… मैं दरवाज़ा बंद कर लूँ जरा, मियाँ मजनू..”
(March 17, 2015)
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आनंद मार्केट रिसर्च में काम करते हैं, और शब्दों में रूचि रखते हैं। किताबों के अपने शौक में वो खूब सारी किताबें पढ़ते हैं। लोगों से बातचीत, समाजशास्त्र, पौराणिक कथाओं, इतिहास से वो अक्सर रोचक कहानियां ढूंढ लाते हैं।

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